10-12-2018 08:15:pm
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जबलपुर किसानों के लिए राहत भरी खबर है कि अब नील गायों की बढ़ती संख्या पर रोक लगाई जा सकेगी। इसके लिए वेटरनरी विवि में हारमोनल कांन्ट्रासेप्टिव ( गर्भ निरोधक) पिल्स पर अनुसंधान अनुप्रयोग अत्याधिक चर्चा में है जिसका उपयोग कर पशुओं की संख्या पर नियंत्रण किया किया जा सकता है। इसी सिद्धांत को मद्देनजर रखते हुये नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के स्कूल आॅफ वाईल्ड लाईफ फारेंसिक एण्ड हेल्थ के वैज्ञानिकों ने गोनेडोट्रोपिक रिलीजिंग हार्मोन और जोना पेल्युसिडा से विकसित की जाने वाली वैक्सीन निर्माण हेतु एक अनुसंधान परियोजना राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, मघ्यप्रदेश सरकार को प्रस्तुत की है, जिसकी सैद्धांतिक स्वीकृति मिल गई है।

6 प्रजातियों से किसानों को खतरा

भारत में 6 मृग प्रजातियां हैं जिसमें नीलगाय सर्वाधिक विशालकाय मृग प्रजाति है। इसके अलावा चौसिंगा, चिंकारा, कृष्ण मृग, तिब्बतीय चिंकारा आदि भी पाये जाते हैं जो जंगल और ग्रामीण इलाकों के तटीय स्थानों में हजारों की सख्ंया में रहते हैं। किसानों की फसल नष्ट करने के कारण भारत सरकार ने नीलगाय को हानिकारक वन्य प्राणियों की श्रेणी में रखा है।

5 करोड़ की है परियोजना

लगभग 5 करोड़ की लागत से चलाई जाने वाली इस परियोजना से गर्भ निरोधक वैक्सीन का निर्माण किया जायेगा जो वन विभाग के सहयोग से नीलगाय के नर तथा मादा दोनो में बांझपन लाने में कारगर साबित होगी और नील गाय जन्मदर नियंत्रण में मील का पत्थर बनेगी।

वैक्सीन बनाने में मिली सफलता

इस परियोजना की कार्य योजना विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. प्रयागदत्त जुयाल के नेतृत्व में, संचालक डॉ. बीसी सरखेल, डॉ. एबी श्रीवास्तव डॉ. केपी सिंह, डॉ. काजल जादव, डॉ. निधि राजपूत तथा डॉ. अमोल रोकड़े आदि वैज्ञानिकों के सम्मलित प्रयासों से वैक्सीन बनाने में सफलता मिली है। वहीं देश के अन्य सस्थाानों से कन्सलटैन्ट वैज्ञानिकों डॉ. अमित गोयल, भारतीय जैव प्रोद्यगिकी संस्थान हैदराबाद तथा आइसीएआर के प्रोफेसर इमरीटस डॉ. आरएस गुप्ता आदि का सहयोग प्राप्त कर यह वैक्सीन बनाई जायेगी।

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